करेंट अफेयर्स 2022 : मध्य प्रदेश के कूनो-पालपुर नेशनल पार्क में बसाए जाएंगे चीते

- मध्य प्रदेश के कूनो-पालपुर नेशनल पार्क में बसाए जाएंगे चीते, नामीबिया से समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर
- भारत सरकार ने देश में एक बार फिर चीता परियोजना की शुरुआत की है। इसके लिए दक्षिणी अफ्रीकी देश नामीबिया के साथ वन्यजीव संरक्षण और सतत जैव-विविधता उपयोग संबंधी समझौता-ज्ञापन पर 20 जुलाई, 2022 को हस्ताक्षर किए गए।
- समझौता ज्ञापन के तहत सितंबर, 2022 में ही नामीबिया से 12 चीते मध्य प्रदेश के कूनो-पालपुर नेशनल पार्क में बसाए जाएंगे।
- वर्तमान में चीते की मौजूदगी दक्षिणी अफ्रीका के नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका, बोत्सवाना और जिम्बाब्वे में है, जहां वे अनुकूल पारिस्थितिकीय-जलवायु विविधता में रहते हैं। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने वर्ष 2010 से 2012 तक देश के 10 स्थानों का सर्वे कराया था। सर्वेक्षणों के बाद भारत में चीते के बसने लायक स्थान मध्यप्रदेश का कूनो-पालपुर नेशनल पार्क पाया गया।
- कूनो राष्ट्रीय उद्यान की वर्तमान क्षमता अधिकतम 21 चीतों की है। एक बड़ा इलाका बहाल हो जाने के बाद वहां 36 चीतों को रखा जा सकता है। शिकार किये जाने वाले जंतुओं की उपलब्धता बढ़ाकर कूनो वन्यजीव प्रखंड (1280 वर्ग किलोमीटर) का शेष हिस्सा भी इसमें शामिल किया जा सकता है।
- कूनो-पालपुर राष्ट्रीय उद्यान के स्थानीय समुदायों के लिये जन जागरूकता अभियान चलाये जा रहे हैं, जिनका स्थानीय शुभंकर 'चिंटू चीता' है।
- नामीबिया के साथ हुए समझौता-ज्ञापन के तहत जैव-विविधता संरक्षण, जिसमें चीते के संरक्षण पर जोर दिया गया है। साथ ही चीते को उनके पुराने इलाके में दोबारा स्थापित करना है, जहां से वे विलुप्त हो गये हैं।
- भारत में चीते को फिर से बसाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2020 में निर्देश दिए थे। इसके बाद पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) को इस महत्वपूर्ण कार्य का भार सौंपा। एनटीसीए का मार्गदर्शन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नामित विशेषज्ञ समिति कर रही है।
चीते के साथ मानव हितों का टकराव कम
- चीते का वैज्ञानिक नाम एसिनोनिक्स ज्यूबेटस है।
- अन्य बड़े मांसाहारी जंतुओं में चीते के साथ मनुष्यों के हितों का टकराव बहुत कम है, क्योंकि चीता मनुष्यों के लिये खतरा नहीं है तथा वे आम तौर पर मवेशियों के बड़े रेवड़ों पर हमला नहीं करता।
- शिकारी पशुओं की सर्वोच्च प्रजाति में से चीते की वापसी से ऐतिहासिक विकासपरक संतुलन कायम होगा, जिसका इको-प्रणाली के विभिन्न स्तरों पर भारी प्रभाव पड़ेगा। इस तरह वन्यजीवों के प्राकृतिक वासों (घास के मैदान, झाडिय़ों वाले मैदान और खुली वन इको-प्रणालियां) की बहाली और उनका बेहतर प्रबंधन संभव होगा। साथ ही उन पशुओं का भी संरक्षण करके उनकी संख्या बढ़ाई जायेगी, जिनका शिकार चीता करता है।
- भारत सरकार ने 1952 में चीते को विलुप्त घोषित किया था। इससे पहले कोरिया (छत्तीसगढ़) के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह देव ने 1947 में तीन चीतों का शिकार किया था। इसके बाद से ही देश से चीते विलुप्त हो गए थे।
- कूनो-पालपुर में चीते को बसाने के लिए 500 हेक्टेयर का बाड़ा तैयार किया गया है, जिसके चारों तरफ सोलर पावर से इलेक्ट्रिक फेंसिंग की गई है।
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